अभी हाल में अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के तमाम हदों को पार कर रही नेता - पूंजीपति के मिलीभगत के विरोध में अनसन पर बैठ गए | फिर क्या था शिक्षित बेरोजगारों का हुजूम , समाचार चैनल की टोली , टीवी पर दिखने की चाहत रखने वाले लोग सबों का मानो तांता लग गया |जंतर - मंतर पर ये कोई पहले दफा नहीं हुआ है ,बिनायेक सेन की गिरफ़्तारी के वक़्त भी लोग यहाँ जुटे थे लेकिन टीवी चैनल की उदासीनता उन्हें हिट नहीं करवा पायी |सायद उस वक़्त भारतीय टीम अफ्रीकी दौरे पर थी |आपको याद दिलाता चलूँ विश्व कप ख़तम होने के बाद ही अन्ना जी का आन्दोलन हिट हो पाया है|
आम तौर पर ऐसे अनसन पर बैठे हुए लोगों का काबू में करने का एक सरल उपाय है सरकार के पास - लाठी चार्ज | पर सरकार जंतर -मंतर पर होशियार थी ...इतिहास उन्हें लाजपत राय पर हुए लाठी चार्ज याद दिला दिया और उन्हें इनका डर हो गया की चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह कहीं न जन्म ले लें |
15 दिनों तक चले इस हाई टेक ड्रामे का अंत हजारे जी निम्बू पानी पीने के साथ हुआ | पुरे देश में धधक रही भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्वाला को २ घूँट निम्बू पानी ने शांत कर दिया है |फिलहाल जो हो रहा है उसमें हम या आम आदमी नहीं है | अनसन पर बैठने वाले हजारे साहब अब 5 सितारा होटल में हजारों रुपये की dinner कर जा रहे हैं | आम आदमी ने पसीना बहा अपना काम कर दिया है ,,हजारे साहब के प्रतिकार का इतेज़ार है अब ..
अनसन पर बैठ अपनी मांगे मनवाने का तरीका कोई नया नहीं है लेकिन इसमें भागीदारों की जमात ज़रूर नयी है |ये अपने को सिविल कहते हैं |खुद को बुद्धिजीवी मानते हैं |भ्रष्टाचार के सबसे बड़े शोषित मजदूर वर्गों को ये खुद के साथ अनसन पर नहीं बुलाते क्यूंकि उससे समां की खूबसूरती बिगड़ जायेगी |
जिस भारत के 60 % जनता को आन्दोलन का हिस्सा नहीं माना जाता वो सफल होगी मुझे तो संदेह है | पर मुझे अन्ना हजारे की इमानदारी और कर्त्तव्य - निष्ठा पर कोई संदेह नहीं है |
दुष्यंत कुमार की पंक्ति को अंत में मै लिखना चाहूँगा
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
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